ठाकुर जी और किशोरी जी

ठाकुर जी और किशोरी जी की सेवा

ठाकुर जी और किशोरी जी

रिंकू अपने मां-बाप का इकलौता बेटा था। रिंकू की मां लोगों के घर काम करती थी। उसका पिता दिहाड़ी मजदूर का काम करता था। रिंकू के माता पिता रिंकू को बहुत प्यार करते थे। वह जितना भी कमाते वह रिंकू की हर इच्छा को पूरा करते थे। सबसे पहले जो भी चीज आती रिंकू का उस पर सबसे पहले अधिकार होता।

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एक दिन गोलू की मां जिस घर में बहुत सालों से काम करती थी उस घर की मालकिन अब बहुत बूढी हो चुकी थी। उसका बेटा बहू विदेश में रहते थे। रिंकू की मां उसके घर का सारा काम करती थी। उसकी मालकिन के घर युगल सरकार की सेवा थी। अधिक बूढ़ी होने के कारण अब उसकी मालकिन युगल सरकार की सेवा नहीं कर पाती थी तो एक दिन उसने रिंकू की मां को पूछा कि, क्या तुम मेरे इस युगल सरकार की सेवा को स्वीकार करोगी?

रिंकू की मां जो कि काफी सालों से उसके घर काम कर रही थी और वह अपनी मालकिन को युगल सरकार की सेवा करते हुए देखती थी तो उसकी भी पूरी श्रद्धा युगल सरकार के प्रति थी।

उसने जल्दी जल्दी से बोला – हां मां जी! क्यों नहीं? यह तो मेरा सौभाग्य होगा जो ठाकुर जी और किशोरी जी की सेवा मुझे प्राप्त होगी। मैं तो धन्य हो उंठूगी।

मालकिन ने कहा कि सोच लो इनकी सेवा बहुत कठिन है। इनको भोग लगाना, स्नान कराना नए-नए वस्त्र पहनाना क्या तुम कर लोगी?

उसने कहा – हां हां मांजी! क्यों नहीं? मुझे स्वीकार है। आप मुझे सेवा दे सकते हैं।

मालकिन ठाकुर जी और किशोरी जी को बहुत प्यार करती थी लेकिन वह उनकी सेवा ना कर पाने के कारण लाचार थी तो बड़ी मजबूरी में उसने भरी आंखों से किशोरी जी और ठाकुर जी को रिंकू की मां की झोली में डाल दिया और कहा – आज से इनकी सेवा तुम्हारा जिम्मा! यह मेरे घर का सबसे बड़ा खजाना है। आज से यह खजाना तुम्हारा हुआ।

रिंकू की मां खुशी से झूमने लगी और घर आकर उसने एक साफ चौंकी पर कपड़ा बिछाकर युगल सरकार को स्थापित किया तभी बाहर से रिंकू भागा भागा अंदर आया और मां से पूछता है कि, मां यह कौन है? क्या यह हमारे घर मेहमान आए हैं? (ठाकुर जी और किशोरी जी)

उसकी मां बोली – बेटा! यह मेहमान नहीं, यह हमारे घर के मालिक हैं। यह हमारे ईश्वर हैं। आज से यह हमारे घर ही रहेंगे।

रिंकू हैरान होकर ठाकुर जी और किशोरी जी की ओर तिरछी नजरों से देखने लगा कि यह ईश्वर कैसे हो सकते हैं? यह घर के मालिक कैसे हो सकते हैं? वह बोला कुछ नहीं और चुपचाप अंदर चला गया। (ठाकुर जी और किशोरी जी)

अब तो घर में जब भी कोई नई चीज बनती चाहे हलवा हो, चाहे कचोरी हो, चाहे खीर हो तो सबसे पहले ठाकुर जी और किशोरी जी को भोग लगता! यह सब चीजें पहले गोलू को सबसे पहले मिलती थीं। अब ठाकुर जी को भोग लगता था तो रिंकू बहुत चिढ़ता!

मां को कहता कि, यह क्या बात हुई? यह तो अब थोड़े दिनों पहले ही आए हैं और आप इनका इतना ध्यान रखती हो! मैं जो कि तेरा बेटा हूं, मुझे बोली – बेटा! यह हमारे भगवान हैं।भगवान को भोग लगाकर ही हम खाते हैं लेकिन रिंकू को इन बातों से कोई मतलब नहीं था वह तो अब युगल सरकार से चिढ़ने लगा।

आते जाते उनको घूर कर जाता और मुंह में बड़बड़ करता जाता। जब से आए हैं तब से मुझे तो कोई पूछता ही नहीं है तो ठाकुर जी की प्रतिमा और किशोरी जी की प्रतिमा मंद-मंद मुस्कुराती रहती और रिंकू और चिढ़ जाता कि यह मुझे चिढ़ाने के लिए हंस रहे हैं।

एक दिन रिंकू की मां काम पर जाने लगी और रिंकू को कहती कि रिंकू! यमुना जी से मटके में जल भरकर लाना आज मैं थोड़ा देर से आऊंगी। (ठाकुर जी और किशोरी जी)

रिंकू कुछ ना बोला। जब वह पानी भरने के लिए जाने लगा तो जाते-जाते किशोरी जी ठाकुर जी को कहता खाने के लिए तो सबसे पहले तैयार रहते हो लेकिन काम तो मुझे ही करना पड़ता है। काम करने के बावजूद भी मुझे तो आपसे बाद में खाना मिलता है। अगर यहां रहना है तो काम करो। कह कर वह यमुना जी से जल भरने के लिए चल पड़ा।

जब यमुना जी में जल भरने लगा तो तभी उसे आवाज आई – ला रिंकू! घडा मुझे दो। मैं भर देता हूं तो रिंकू ने इधर-उधर देखा कि वहां कोई नहीं था, फिर वही आवाज आई तो रिंकू ने देखा यमुना जी के अंदर ठाकुर जी और किशोरी जी विराजमान है और दोनों बाजू ऊपर उठाकर कह रहे हैं – ला रिंकू! घडा हम भर देते हैं। (ठाकुर जी और किशोरी जी)

रिंकू उन दोनों को देखकर एकदम से हैरान हो गया तो बोला – नहीं नहीं! मैं अपने आप भर लूंगा लेकिन ठाकुर जी ने उसके हाथ से घड़ा ले लिया और भरकर उसके पीछे पीछे घर ले आए। (ठाकुर जी और किशोरी जी)

रिंकू तो एकदम से हक्का-बक्का हो गया था। उसको कुछ नहीं सूझ रहा था। वह घर आकर चुपचाप एक कोने में बैठ गया और डर रहा था कि अगर मां को पता लगा कि मैंने ठाकुर जी और किशोरी जी से काम करवाया है तो आज तो मेरी पिटाई पक्की होगी।

जब उसकी मां घर आई तो उनके आते ही रिंकू बोला – मां मैंने नहीं कहा था इनको पानी भरने के लिए, यह खुद ही आ गए थे मेरे पीछे पीछे! अब देखो गीले कपड़ों में बैठे हुए हैं तो रिंकू की मां ने जब किशोरी जी और ठाकुर जी को गीले कपड़ों में देखा तो एकदम से हैरान हो गई और कहने लगी कि, यह जरूर तेरी शरारत है। तूने जरूर इन पर जल डाला है और अब बातें बना रहा है। (ठाकुर जी और किशोरी जी)

रिंकू ने अपनी मां को समझाने का बहुत प्रयास किया लेकिन मां ने उसको डांट कर चुप करा दिया और ठाकुर जी के वस्त्र को बदलने लगी।

अब तो रिंकू को युगल सरकार पर और गुस्सा आया। इनके कारण मुझे डांट पड़ी है मैंने तो नहीं इनको बोला था काम करने के लिए! अगले दिन मां फिर काम पर गई और रिंकू को बोली – रिंकू! तेरे बाबा कुछ काम से बाहर गए हैं और घर में अनाज नहीं है तो कुछ अनाज लेकर चक्की से पिसवा लाना तब तक मैं लोगों के घर का काम करके आती हूं।

रिंकू ने हामी भर दी। रिंकू ने अनाज का कनस्तर धीरे से उठाया कि कहीं फिर ना युगल सरकार मेरे पीछे आ जाएँ और दबे पाँव घर से बाहर निकल गया लेकिन यह क्या ठाकुर जी और किशोरी जी तो वहां पहले से ही खड़े थे और रिंकू के हाथ से कनस्तर लेकर अनाज पिसवा कर घर ले आए। (ठाकुर जी और किशोरी जी)

घर आकर रिंकू का डर के मारे फिर बुरा हाल था कि अगर मां को पता चल गया आज उन्होंने फिर काम किया है तो मां फिर मुझे डांट लगाएगी। वह चुपचाप दरवाजे की ओट में छिप गया।

जब मां आई तो उसने ठाकुर जी और किशोरी जी के वस्त्र ऊपर सूखा आटा पड़ा देखा तो वह रिंकू-रिंकू कह कर चिल्लाने लगी कि तुझे नहीं पता कि यह हमारे भगवान है और तू भगवान के साथ शरारत करता है। आज तूने फिर इनके ऊपर आटा फैंका है तो रिंकू शपथ लेकर कहने लगा – नहीं मां! यह तो मेरे हाथ से गेहूं का कनस्तर लेकर खुद पिसवा कर आए हैं तो रिंकू की मां आज बहुत गुस्सा हुई और बोली तू तो जानबूझकर किशोरी जी और ठाकुर जी पर इल्जाम लगा रहे हो। वह तो हमारे भगवान हैं। आज तुझे खाना नहीं मिलेगा। आज तुम्हारी यही सजा है। (ठाकुर जी और किशोरी जी)

रिंकू मन ही मन ठाकुर जी और किशोरी जी पर गुस्सा करता हुआ अंदर कमरे में जाकर चुपचाप बैठ गया। जब उसकी मां का थोड़ा गुस्सा शांत हुआ तो उसने आकर रिंकू को बड़े प्यार से समझाया कि ऐसे हमें अपने भगवान को नहीं सताना चाहिए तो रिंकू आंखों में आंसू भरकर रह गया लेकिन बोला कुछ नहीं।

अगले दिन फिर उसकी मां बोली – बेटा! आज तुम्हारे बाबा ने आ जाना है। बस आज का ही काम है। तुम जंगल से थोड़ी लकड़ियाँ ले आओ ताकि मैं आकर भोजन बना सकूं! अगर मैं लेने गई तो काफी समय लग जाएगा। बस आज का ही काम कर दो। रिंकू फिर डर गया। कहीं ठाकुर जी और किशोरी जी फिर मेरे पीछे ना आ जाएँ।

रिंकू ने मां को बोला कि, मैं चला तो जाऊंगा लेकिन अपनी युगल सरकार को समझा लो वह मेरे पीछे ना आएँ।

उसकी मां हंसकर बोली – हां-हां! समझा दूंगी। तुम जाओ तो सही।

रिंकू जल्दी-जल्दी लकड़ियां लेने जंगल में चला गया तो उसकी मां काम पर चली गई लेकिन उसकी मां काम से जल्दी वापस आ गई। जब घर वापस आई तो उसने देखा युगल सरकार अपनी चौकी पर विराजमान नहीं है वह तो एकदम से घबरा गई कि कहीं रिंकू की शरारत तो नहीं कहीं युगल सरकार को कहीं रख तो नहीं आया तो वह भागी भागी जंगल की तरफ गई तभी उसने देखा कि रिंकू के साथ दो लोग और लकड़ियों को लेकर घर आ रहे हैं।

रिंकू की मां यह देखकर हैरान हो गई कि यह तो किशोरी जी और ठाकुर जी हैं। वह तो एकदम से हैरान परेशान होकर मूर्छित होते होते बची। यह क्या हमारे भगवान हमारा काम कर रहे हैं? इसका अर्थ रिंकू ठीक कह रहा था।

वह जल्दी-जल्दी भागकर ठाकुर जी और किशोरी जी के पास गई और लकड़ियाँ उनके हाथ से लेते हुए उनके चरणों में गिर कर रोती हुई बोली – हे भगवान! हे लाडली जू सरकार! यह आप क्या कर रहे हो? मुझ गरीब का काम क्यों कर रहे हो?

ठाकुर जी और किशोरी जी मुस्कुराते हुए बोले – हमे तो तेरे बेटे पर बहुत प्यार आता है। सब लोग हमें भगवान समझते हैं लेकिन एक तेरा बेटा ही था जो हम को अपना मानता था। अपना मान कर वो हमें डांट भी देता था। हमारे साथ गुस्सा भी करता था। वह हमारे साथ ऐसा व्यवहार करता था कि जैसे हम उसके अपने हैं। शेष लोग तो हमें भगवान मानकर हमारी पूजा करते हैं और हमें जो एक बार अपना मान लेता है तो हम उसके मान के लिए उसके ही हो जाते हैं। तुम्हारा बेटा रिंकू बहुत ही भोला है और उसके मन में कोई पाप नहीं इसलिए हमें रिंकू के साथ काम करने में कोई लज्जा नहीं!

रिंकू उनकी बातें सुन रहा था। वह आकर अपनी मां के पास साथ बैठ गया और हाथ जोड़कर ठाकुर जी से प्रार्थना करने लगा – हे श्यामा श्याम जू! मुझे नहीं पता था कि आप भगवान हो! मैंने भूलवश आपको कई बातें सुना दीं। मेरी भूल को क्षमा करो।

भगवान ने उसको उठाकर अपने हृदय से लगाते हुए कहा – नहीं नहीं रिंकू! तू तो हमारा बहुत प्रिय सखा है। तुम जैसे भोले भाले भक्त हम को बहुत प्रिय हैं। पापी और दुराचारी लोगों से तो दुनिया भरी पड़ी है। तुम जैसे लोग तो कम ही इस दुनिया में हैं। ठाकुर जी और किशोरी जी उस घर में ईश्वर के रूप में ना रहकर उनके घर का सदस्य बनकर रहने लगे।

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